आज चौबे जी सुबह से ही बैठे हैं पिन्डोगी बाबा के चबूतरा पर , एक दिन के उपवास पर जो हैं । इसलिए नहीं कि भगवान से उनका कोई नाता है या फिर वे परलोक सुधारने के चक्कर में हैं। कहते हैं चौबे जी कि ये लोक तो चमची मार कर मजे से कट गया। अगले लोक में भी कोई न कोई चमचा प्रेमी मिल ही जाएगा। भगवान के नाम पर तो सब उपवास रखते हैं कभी कुकर्मियों के नाम पर उपवास रखते सुना है ? देश के रखवालों ने ऐसी भरी तिजोरी के हिल गया पूरा हिन्दुस्तान, ससुर खाए तो खाए स्विश बैंक में भी ले जाकर भर आये ...नेता भगवान से भी ज्यादा ताक़तबर हो गया है राबनवा की तरह , भाई पूजा उसी की होती है जो ताक़तबर होता है .... नेता प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। तरक्की के दरवाजे खोलता है। धन कमाने के नये.नये तरीके अपनाता है। रिश्वत के रेट बढ़ा देता है या कमीशन का परसेंटेज बढ़ा देता है। गबन करने की जुगाड़ लगाता या कोई बड़ा घोटाला करने की फिराक में रहता है। इससे व्यवस्था में गति बनी रहती है। इसी को पढ़े लिखे लोगों की भाषा में विकास कहते हैं। इतना कहकर चौबे जी ने हवन कुंड में घी डालते हुए कहा -

ओम श्री कुर्सिये नमः।।

माफ़ करना भगवान् ...यह हवन आज अन्याय और कुकर्म करने वाले देश के नेताओं को समर्पित है , सो तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं यहाँ । चौबे जी ने मन ही मन कहा

कलयुग के भगवान तुम्हारी जय हो ! तुम्हारे पास चमचमाती कार है, आलीशान बंगला है ढेर सारा रूपया है ... लजीज व्यंजन खाते हो ... विदेशी शराब और अर्द्धनगन सुन्दरियां तुम्हारी शाम को हसीन बनाती है।तुम्हारी कावलियत तुम्हारे पुरषार्थ की पृष्ठभूमि है ....कौन है इस जग में भूप जो तुम्हारी नंगई को नगा कर दे , जो तुम्हें नंगा करने की सोचेगा खुद नंगा हो जाएगा । आदमी सादा जीवन की विचारधारा का पैरोकार होता है इसलिए तुम्हें जी खोलकर लूटने का अधिकार होता है , तुम्हारी महिमा अपरंपार है नेताओं ।इतना कहकर चौबे जी ने हवन कुंड में दुबारा फिर घी डालते हुए कहा -

ओम श्री मुद्राय नमः।।

तभी धनेसरा ने चुप्पी तोड़ी और बोला कि महाराज, अण्णा ने देश की राजधानी में आमरण अनशन पर बईठ के देश के गद्दारों को ललकारा है , आज़ादी की दूसरी लड़ाई शुरू हो चुकी है इसीलिए हम भी रख लिए उपवास एक दिन के लिए !

बहुत अच्छा किया भाई, मगर ये तो बता कि ये अण्णा कौन है ? तपाक से बोला बटेसर

गाँधी की विरासत उनकी थाथी है। कद-काठी में वह साधारण ही हैं। सिर पर गाँधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने मौत को भी धता दे दी थी। उनकी प्लाटून के सारे सदस्य मारे गए थे। ऐसी शख्सियत है किसन बाबूराव हजारे की। प्यार से लोग उन्हें अन्ना हजारे बुलाते हैं। उन्हें छोटा गाँधी भी कहा जा सकता है।चौबे जी ने कहा

वे आजकल क्यों बईठे हैं अनशन पर ? पूछा गजोधर

अन्ना आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। वह गुस्से में हैं। उनकी चेतावनी से फिलहाल केंद्र सरकार हिल गई है। पहले भी वह महाराष्ट्र सरकार के पांच मंत्रियों की बलि ले चुके हैं। प्रधानमंत्री ने अन्ना से इस बारे में बातचीत की है। आश्वासन भी दिया है, लेकिन अन्ना तो अन्ना हैं, नेता तो है नहीं जो अपनी बातों से मुकर जायेंगे । उन्होंने कहा है कि ठोस कुछ नहीं हुआ तो वह दिल्ली को हिला देंगे। अन्ना ने आज तक जो सोचा है, उसे कर दिखाया है। उन्होंने शराब में डूबे अपने पथरीले गाँव रालेगन सिद्धि को दुनिया के सामने एक मॉडल बनाकर पेश किया। रामराज के दर्शन करने हैं तो उसे देखा जा सकता है। इस काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया। सूचना के अधिकार की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चौबे जी ने कहा

तभी अपनी जिज्ञासा को शांत करने के उद्देश्य से पूछ बैठे पिन्डोगी बाबा कि ई बताओ चौबे जी -"रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा ....?"

फ़ायदा है महाराज...अगर यही सोच गांधी जी की होती तो आज हम आज़ाद नहीं होते ....फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय हम विदेशियों से लडे थे आज अपने देश के कुकर्मियों से लड़ने जा रहे हैं यानी आज़ादी के दूसरी लड़ाई है यह ....! चौबे जी ने कहा

फिर राम भरोसे से मुखातिव होते हुए बोले कि कुछ भजन-कीर्तन भी हो जाए ?

हाँ-हाँ भजन-कीर्तन के लिए हारमोनियम, ढोलक, झाल-मजीरा सब लाए हैं हम अपने साथ और पूरी मंडली भी ....पान के गुलगुली मुंह में दबाये पिच्च से फेंकते हुए बोला राम भरोसे ।

सभी मिलकर गाने लगे -

" दाल काली भयो, कोष खाली भयो .....जल गयो नोट के होलियाँ .....

कुछ तुम्हारी लगी बोलियाँ, कुछ हमारी लगी बोलियाँ !

है मुखर माफिया और प्रखर चोर भी....सबकी चांदी हुयी हर तरफ शोर भी

हो गया फिर से सत्ता का द्रौपदीकारण.....और दुर्योधन से कान्हा का गठजोड़ भी

नेता की जय कहो......आओ पूजा करो

पाँव उनके धरो देवियाँ ....कुछ तुम्हारी लगी बोलियाँ, कुछ हमारी लगी बोलियाँ !"

रवीन्द्र प्रभात  

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